अहिंसा सबसे उच्चतम नैतिक गुण: भगवान महावीर

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भगवान महावीर ने कहा: व्यक्ति जन्म से नहीं कर्म से श्रेष्ठ है 
तीर्थंकर महावीर ने दिया: सृष्टि को जियो और जीने दो का अमर संदेश
तीर्थंकर महावीर ने फैलाया: सृष्टि में ज्ञान का प्रकाश
भगवान महावीर ने दिया :जनजन को अहिंसा का जन संदेश
भगवान महावीर अहिंसा के पथ दर्शक 

City24news/अनिल मोहनियां
नूंह| अहिंसा के पथदर्शक जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी का 2623 वां जन्म कल्याणक मना रहे है उक्त जानकारी देते हुए सर्वजातीय सेवा समिति के उपाध्यक्ष व समाजसेवी रजत जैन ने बताया की भगवान महावीर स्वामी ने प्राणीमात्र के कल्याण के लिए जियो और जीने दो का अमर संदेश जनजन को दिया ओर अहिंसा के पथ पर चलने का मार्ग प्रशस्त किया। भगवान महावीर ने अहिंसा को सबसे उत्तम नैतिक गुण बताया है। रजत जैन ने बताया की भगवान महावीर स्वामी का जन्म 2622 वर्ष पूर्व कुंडलपुर में हुआ। पूर्व में सारी सृष्टि में जब हाहाकार मचा हुआ था।जनमानस अपने आचरण (आचार विचार) से दिग्भ्रमित होकर अधार्मिक कार्यों में अधिक संग्लन होने लगी तो ईसा से 599 वर्ष पूर्व चैत्र माह के शुक्ल पक्ष में त्रयोदशी को कुण्डलपुर के राजा सिद्धार्थ व रानी त्रिशला के घर वर्धमान नामक बालक का जन्म हुआ।

  रजत ने कहा जब सृष्टि चहुँओर घोर अंधकार व निराशा के गहरे सागर में डूबी हुई थी तो इस वर्धमान ने जनमानस में नवऊर्जा, चेतना,उमंग,उत्साह,उल्हास का संचार किया।जैन धर्म के मूल सिद्धांत अहिंसा परमो धर्म: के पथ (मार्ग)पर चलकर, समस्त प्राणिमात्र के आत्मकल्याण के लिए, अहिंसा का मार्ग प्रशस्त कर , जनकल्याण की भावना जनजन के मन मे जागृत कर जनता को घोर निराशा व अंधकार के गहरे सागर से बाहर निकालकर ज्ञान के सागर में ज्ञान का प्रकाश चहुँओर फैलाया। 30 वर्ष की आयु में धन ,वैभव, मोह, माया,लोभ,लालच,इत्यादि छोड़कर तपस्वी जीवन धारण कर वैराग्य ले लिया।उन्होंने कहा की व्यक्ति जन्म से नहीं कर्म से श्रेष्ठ है, वे छुआछूत,ऊँचनीच के विरोधी थे।बाद में यही बालक वर्धमान,तीर्थंकर भगवान महावीर कहलाया ओर जैन धर्म के अंतिम 24वें तीर्थंकर बने।इसलिए प्रत्येक प्राणिमात्र को एक दूसरे के प्रति वैरभाव त्याग कर,प्राणिमात्र को आपस में सद्भावना,व मैत्रीभाव से रहना चाहिए।अहिंसा के पथ पर चलकर, “जीओ ओर जीने दो”के सिद्धांत का अंगीकार कर अपना व समस्त जगत के प्राणिमात्र का आत्मकल्याण करना चाहिए।

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