शौच धर्म का प्रयोजन ही आत्मा को पवित्र करना है :रजत जैन

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-आत्मा को पवित्र करने का भाव आना ही शौच धर्म :जैन
City24news/अनिल मोहनिया

नूंह | जो व्यक्ति स्नानादि से साफ स्वच्छ कर देने को शौच मानते है, ये मात्र छलावा है।जबकी शौच धर्म का प्रयोजन तो आत्मा को पवित्र करने होता है, शरीर से इसका कोई सम्बन्ध नही है।उक्त जानकारी सर्व जातीय सेवा समिति के उपाध्यक्ष रजत जैन ने बताया की अनादिकाल से ये आत्मा लोभरुपी मल से मलिन है।इससे पवित्र करने का भाव आना ही शौच धर्म है। जैन ने बताया की लोभ चार प्रकार के होते है।जीवन का लोभ,निरोगता का लोभ, भाग्य सामग्री का लोभ, इन्द्रियों का लोभ,इन चारों लोभो के अत्यन्त भावो को जानना ही शौच धर्म है। रजत ने कहा की अनादिकाल से आत्मा सप्तधातु मय शरीर के संसर्ग से अपवित्र कहलाता है।मनुष्य शुद्धात्मा का ध्यान करके इस अपवित्र शरीर में रत नही रहता एवं विचार करता है कि में शुद्ध बुध्द हूँ।निर्मल स्फटिक के समान हू।मेरी आत्मा अनादिकाल से शुद्ध है।इस प्रकार के भाव सदा हृदय में ध्यान करता है।वह शुचित्व है वस्तुतः आत्मा का स्वरुप ही शौच धर्म है।जो स्वभाव व संतोष रुपी जल से लोभरुपी मल को धोता है उसी में शौच धर्म होता है।

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