सरल,सच्चाई,कर्तव्यनिष्ठ,सत्यनिष्ठा का पालन करना ही उत्तम आर्जव धर्म : उपाध्यक्ष : रजत 

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-सम्यग्ज्ञान पूर्वक सरल भाव से रहना उत्तम आर्जव धर्म : रजत जैन
-सरल भाव से रहना ही आर्जव धर्म : रजत 
-उत्तमआर्जव धर्म की पालना से ही कल्याण सम्भव : रजत जैन 
City24news/अनिल मोहनिया

नूंह | मन वचन काय की कुटिलता को त्याग कर छल कपट छोडक़र सोच कथनी और करनी में अंतर ना होना। सम्यग्ज्ञान पूर्वक सरल भाव से रहना उत्तम आर्जव धर्म है। जैन धर्म के दशलक्षणों में उत्तम आर्जव धर्म तृतीय धर्म है । सर्व जातीय सेवा समिति के उपाध्यक्ष रजत जैन ने बताया की व्यक्ति को अपना जीवन यापन करने के लिए धन-संपत्ति की आवश्यकता पड़ती है एवं वो इसके लिए उसका अर्जन भी करता है। इसलिए उसको इसका अर्जन करते समय ध्यान रखना चाहिए की वह इसका अर्जन न्याययिक तरीके से करें ना की माया चारी व अनैतिक तरीके से। हम अक्सर विचार करते हैं की माया चारी अनैतिक तरीका अपनाकर हमने अपना भला कर लिया है और लाभ उठा लिया है। अपितु सत्य तो यह है कि हमने मायाचारी व अनैतिक कार्य से हम अपनी आत्मा को भयंकर हानि व पीड़ा पहुंचा रहे हैं इसके सिवाय कुछ नहीं। महावीर ने बताया की इसलिए सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यग्चारित्र, तथा सम्यक्तप, ये चारों गुण आत्मा में ही विद्यमान है अत: आत्मा की सरल लो अपने हृदय से छल कपट मायाचार निकाल कर उत्तमआर्जव धर्म की पालना करो तभी कल्याण संभव है ।सरल,सच्चाई, कर्तव्यनिष्ठ, सत्यनिष्ठा, का सदैव पालन करना चाहिए।मन वचन काय की कुटिलता को त्याग कर छल कपट छोडक़र सोच कथनी और करनी में अंतर ना होना। सम्यग्ज्ञान पूर्वक सरल भाव से रहना उत्तम आर्जव धर्म है।जैन धर्म के दशलक्षणों में उत्तम आर्जव धर्म तीसरा है। रजत ने बताया की व्यक्ति को अपना जीवन यापन करने के लिए धन-संपत्ति की आवश्यकता पड़ती है एवं वो इसके लिए उसका अर्जन भी करता है। इसलिए उसको इसका अर्जन करते समय ध्यान रखना चाहिए की वह इसका अर्जन न्याययिक तरीके से करें नाक की माया चारी व अनैतिक तरीके से। हम अक्सर विचार करते हैं की माया चारी अनैतिक तरीका अपनाकर हमने अपना भला कर लिया है और लाभ उठा लिया है। अपितु सत्य तो यह है कि हमने मायाचारी व अनैतिक कार्य से हम अपनी आत्मा को भयंकर हानि व पीड़ा पहुंचा रहे हैं इसके सिवाय कुछ नहीं। इसलिए सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यग्चारित्र, तथा सम्यक्तप, ये चारों गुण आत्मा में ही विद्यमान है अत: आत्मा की सरल लो अपने हृदय से छल कपट मायाचार निकाल कर उत्तमआर्जव धर्म की पालना करो तभी कल्याण संभव है ।

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