सिहोर का दिव्यांग सीनियर सिटीजन रामनिवास बना आमजन के लिए प्रेरणास्रोत

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-कुर्सी,पीढा व पीढी का पलंग बुनाई करने के काम से प्राप्त की प्रसिद्धि
City24news/सुनील दीक्षित
कनीना | कनीना विकास खंड के गांव सिहोर निवासी 74 वर्षीय सीनियर सिटीजन रामनिवास भले ही शारिरिक रूप से दिव्यांग है लेकिन हुनर के मामले में दूसरे के लिए प्रेरणा स्रोत है। जन्म से दिव्यांग होने के चलते उन्होंने जिंदगी से हार नहीं मानी ओर 28 वर्ष की आयु में हाथ का हुनर सीखकर जीवन में उजियारा भर दिया। रामनिवास प्लास्टिक तारों की कुर्सी से लेकर पीढी का पलंग भरने में माहिर है उनके पास दूर-दराज से नागरिक कुर्सी, पीढा, पंलग, खाट की बुनाई करवाने के लिए आते हैं। जिन्हें अच्छे एवं सुंदर डिजाइन के साथ तैयार किया जाता है। उन्होंने बताया कि शिशुकाल के समय उनका पोलियो बिगड गया था जिसके कारण वह दोनों पैरों से चलने में असमर्थ है। यौवन में वे बैसाखी के सहारे चलते थे लेकिन उम्र के अंतिम पडाव एवं शारिरिक दुर्बलता के चलते अब वे इलेक्ट्रिक साइकिल से ईधर-उधर जाते हैं। ये साईकिल उन्हें रैडक्राॅस सोसायटी नारनौल द्वारा प्रदान की गई है।
उन्होंने बताया कि दिव्यांग होने के चलते भारी काम करने में असमर्थ हैं। अविवाहित रामनिवास पिछले 45 वर्ष से उपरोक्त कार्य कर रहा है। जिससे उनका समय व्यतीत हो जाता है वहीं मेहनताना लेने से आजीविका भी चल जाती है। आसपास के क्षेत्र में उनके काम की  प्रसिद्धि है। उन्होंने बताया कि वर्तमान समय में विवाह शादी के दौरान दिवान व बैड इस्तेमाल करने का प्रचलन बढ गया है लेकिन 45 वर्ष पूर्व विवाह-शादियों, भात-छुछक आदि सामाजिक समारोहों में पीढी का पलंग, पीढा व खटौला प्रदान किया जाता था। जिसकी बुनाई के लिए उनके पास एडवांस बुंिकंग होती थी। आज भी उनकी ओर से पीढी का पलंग 4 दिन में तैयार कर दिया जाता है। इस हुनर को बनाए रखने के लिए उन्होंने गांव की दो व्यक्तियों को प्रशिक्षित किया है। जो इस कार्य में रूचि ले रहे हैं।
रामनिवास का कहना है कि विभिन्न सरकारी कार्यालयों में कार्यरत अधिकारी व कर्मचारी भी उस समय निजी एवं कार्यालयों के लिए प्लास्टिक के तारों से कुर्सी की बुनाई करवाकर ले जाते थे। जो लंबे समय तक बैठने में आरामदायक सिद्ध होती थी।

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