कविता- साइकिल
रचयिता- डॉ. अशोक कुमार वर्मा
छोड़ो अब शर्माना, अच्छा स्वास्थ्य चाहिए,
तो साइकिल से करो आना-जाना।
युवा वही जो श्रम को अपना साथी माने,
विलासिता की बेड़ियाँ तोड़, आगे बढ़े तो जाने।
पसीने की हर बूँद में छुपा है उज्ज्वल कल,
जो चलता है दो पहियों पर, वही रचता है संबल।
न धुएँ की चादर, न ईंधन का नुकसान,
साइकिल चले सड़क पर मिले जाम से निदान।
हवा से जो नाता जोड़े, तन-मन दोनों खिल जाएँ,
आलस, रोग और नशा—खुद-ब-खुद मिट जाएँ।
गाँव-नगर, गली-डगर, संदेश यही फैलाना,
स्वस्थ समाज का पहला कदम—साइकिल को अपनाना।
जब युवा चलेगा इस पथ पर, लेकर नया तराना,
तब सशक्त, स्वच्छ भारत में होगा नया जमाना।
