सीमाओं पर सैनिक और सड़कों पर नागरिक- दोनों का कर्तव्य ही राष्ट्र सेवा है
गणतंत्र दिवस पर
देशभक्ति : नारों से नहीं, कर्तव्यों से
लेखक : डॉ. अशोक कुमार वर्मा
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City24News/ओम यादव
फरीदाबाद | माँ तुझे सलाम… यह गीत जैसे ही सुनाई देता है, प्रत्येक भारतीय के हृदय में देशप्रेम की भावना हिलोरे मारने लगती है। मन गर्व से भर उठता है और ऐसा प्रतीत होता है मानो यह देश ही हमारा सर्वस्व हो। उस क्षण लगता है कि भारत के लिए हम अपना सब कुछ न्योछावर कर सकते हैं। आँखें नम हो जाती हैं, सीना चौड़ा हो जाता है और आत्मा राष्ट्र के प्रति समर्पण से भर उठती है।
परंतु यह भावनात्मक ज्वार अधिक देर तक नहीं टिकता। जैसे ही गीत समाप्त होता है और हम उस वातावरण से बाहर निकलते हैं, हम फिर से अपने निजी स्वार्थों, सुविधाओं और भौतिक जीवन की दौड़ में लौट जाते हैं।
हम भूल जाते हैं उन लाखों शहीदों को जिन्होंने भारत माता को स्वतंत्र कराने के लिए अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया। कोई हँसते-हँसते फाँसी के फंदे पर झूल गया, किसी ने जेलों की अमानवीय यातनाएँ सह लीं, किसी ने अपना पूरा परिवार, अपनी जवानी और अपने सपने देश के लिए बलिदान कर दिए।
हम भूल जाते हैं उन वीर सैनिकों को जो आज भी देश की सीमाओं पर तैनात हैं—भीषण सर्दी, प्रचंड गर्मी, वर्षा और दुर्गम परिस्थितियों की परवाह किए बिना—ताकि हम देश के भीतर सुरक्षित और निश्चिंत जीवन जी सकें।
हम भूल जाते हैं भारत माता की उस पावन मिट्टी को जहाँ हमने जन्म लिया, खेला-कूदा और आज स्वतंत्र होकर सांस ले रहे हैं।
आज का मानव केवल अपने स्वार्थ और भौतिक सुखों के पीछे भाग रहा है। उसे देश से कोई सीधा सरोकार नहीं दिखाई देता। उसे बस सुविधाएँ चाहिए—चाहे वे जैसे भी प्राप्त हों। इन्हीं सुविधाओं की पूर्ति के लिए आज मनुष्य ठगी, बेईमानी, मिलावट और भ्रष्टाचार जैसे काले धंधों में संलिप्त होता जा रहा है। नैतिकता, ईमानदारी और सामाजिक उत्तरदायित्व जैसे मूल्य धीरे-धीरे हमारे व्यवहार से गायब होते जा रहे हैं।
आज का नागरिक केवल अपने अधिकारों की बात करता है।
वह बार-बार पूछता है— देश ने मुझे क्या दिया?
लेकिन शायद ही कभी यह प्रश्न करता है— मैंने देश को क्या दिया?
यदि हम अपने दैनिक जीवन पर ईमानदारी से दृष्टि डालें, तो सच्चाई स्वयं सामने आ जाती है। जब हम सड़कों का प्रयोग करते हैं, तो क्या हम यातायात नियमों का पालन करते हैं? चाहे हम पैदल हों या वाहन में, हम चलते-फिरते केले के छिलके, मूंगफली या अन्य कचरा सड़क पर फेंक देते हैं। क्या कभी हमने सोचा है कि यह किसी के लिए जानलेवा भी हो सकता है? कोई व्यक्ति फिसल कर गंभीर रूप से घायल हो सकता है, कोई मोटरसाइकिल सवार दुर्घटना का शिकार हो सकता है।
हम अपने लिए हर सुख-सुविधा का उपयोग करते हैं—एयर कंडीशनर में रहना, एयर कंडीशनर में चलना—पर बदले में देश को क्या देते हैं? बढ़ता हुआ प्रदूषण।
आज प्रदूषण केवल समस्या नहीं, बल्कि हमारी आदत बन चुका है।
ध्वनि प्रदूषण फैलाने में आज की युवा पीढ़ी के कुछ युवाओं का कोई मुकाबला नहीं। साइलेंसर रहित मोटरसाइकिलों की कर्कश आवाज़, पटाखों जैसी धमक लोगों को भयभीत कर देती है। कई बार ऐसा प्रतीत होता है मानो गोली चल गई हो। कमजोर हृदय वाले व्यक्तियों के लिए यह स्थिति अत्यंत घातक हो सकती है।
यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है—क्या इस प्रकार के कृत्य करने वाला व्यक्ति स्वयं को देशभक्त कहने का अधिकार रखता है?
आजकल कांवड़ यात्रा के दौरान अनेक युवा भारत माता के तिरंगे झंडे को बड़े सम्मान और गर्व के साथ लेकर चलते हैं। यह निस्संदेह एक सराहनीय और सकारात्मक पहल है, क्योंकि हमारे लिए तिरंगे से बढ़कर कुछ भी नहीं है।
परंतु जब यही युवा यातायात नियमों की खुलेआम अवहेलना करते हैं, सड़क सुरक्षा को खतरे में डालते हैं और दूसरों के जीवन को जोखिम में डालते हैं, तब यह सोचने की आवश्यकता होती है कि क्या यही देशप्रेम है?
तो फिर प्रश्न उठता है—देशभक्ति वास्तव में है क्या?
क्या केवल देशभक्ति के गीत सुन लेना, नारे लगा देना या झंडा थाम लेना ही देशप्रेम कहलाता है?
सच्चाई यह है कि देशभक्ति का वास्तविक अर्थ है—अपने कर्तव्य को पूरी ईमानदारी, अनुशासन और निष्ठा से निभाना।
सीमा पर खड़ा जवान अपने कर्तव्य का निर्वहन कर रहा है, इसलिए वह सच्चा देशभक्त है।
सड़क के चौराहे पर खड़ा पुलिसकर्मी जब यातायात को सुरक्षित रूप से संचालित करता है, तब वह भी अपने कर्तव्य के माध्यम से देश की सेवा कर रहा होता है।
एक शिक्षक ईमानदारी से पढ़ाकर, एक चिकित्सक निष्ठा से उपचार करके, एक कर्मचारी ईमानदारी से अपना काम करके भी देशभक्ति निभा सकता है।
यदि देश का प्रत्येक नागरिक अपने-अपने दायित्वों को इसी भावना से निभाए, तो वह दिन दूर नहीं जब भारत विश्व के अग्रणी देशों में प्रथम स्थान प्राप्त करेगा।
यह देश केवल भूमि का टुकड़ा नहीं है। यह गुरु-पीर-फकीरों, ऋषि-मुनियों और महापुरुषों का देश है। गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज जैसे महापुरुषों ने देश और धर्म की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया, किंतु देश की आन, बान और शान को कभी झुकने नहीं दिया।
आज भारत स्वतंत्र है।
अब देश को बलिदान की नहीं, बल्कि जागरूक, जिम्मेदार और संस्कारी नागरिकों की आवश्यकता है।
आज आवश्यकता है अपने सोए हुए ज़मीर को जगाने की, अपनी महान संस्कृति और सभ्यता को समझने की—जिसका लोहा आज पूरा विश्व मान चुका है।
हमें कहीं बाहर जाने की आवश्यकता नहीं है। हमें अपने धर्मग्रंथों, अपनी परंपराओं और अपने संस्कारों का अध्ययन करना चाहिए, ताकि हमारे भीतर नैतिकता, अनुशासन और राष्ट्रप्रेम की भावना जागृत हो सके।
अक्सर लोग मुझसे कहते हैं कि वे समाज सेवा करना चाहते हैं।
मैं उनसे सरल शब्दों में कहता हूँ—समाज सेवा अपने घर से प्रारंभ करें।
अपने बच्चों को अच्छे संस्कार दें, उन्हें देशप्रेम, अनुशासन और जिम्मेदारी का पाठ पढ़ाएँ।
समाज सेवा के लिए बड़े मंच, पद या प्रचार की आवश्यकता नहीं होती।
छोटे-छोटे कार्य भी बड़ी सेवा बन जाते हैं—
सड़क पर पड़ा केला का छिलका उठाकर कूड़ेदान में डाल देना,
व्यर्थ बहते पानी को रोक देना,
लोगों को समझाना कि वाहन बाल्टी में पानी लेकर भी धोए जा सकते हैं, जिससे जल संरक्षण हो सके।
आज हमारे देश का सौभाग्य है कि हमें श्री नरेंद्र मोदी जी जैसे प्रधानमंत्री मिले हैं, जिन्होंने स्वच्छता, आत्मनिर्भरता, अनुशासन और राष्ट्रप्रेम की भावना को जन-जन तक पहुँचाने का कार्य किया है।
अब समय आ गया है कि हम यह समझें कि देशभक्ति केवल शब्दों में नहीं, व्यवहार में दिखाई देनी चाहिए। नारे लगाने से नहीं, चरित्र निर्माण से देश आगे बढ़ता है। यदि प्रत्येक नागरिक अपने कर्तव्य को देश के प्रति सेवा मानकर निभाए, तो भारत को विश्व गुरु बनने से कोई शक्ति नहीं रोक सकती।
